बीकानेर। पीबीएम हॉस्पिटल का मेन गेट पांच साल तक बंद रहा, किसी की आंख नहीं खुली। न मरीज दिखे, न अफसरों को दिक्कत लगी। लेकिन जैसे ही ताले पर जोर पड़ा, सिस्टम चौकन्ना हो गया। अब जांच होगी, कमेटी बनेगी और रिपोर्ट जयपुर जाएगी।
मेन गेट को बलपूर्वक खोलने के मामले में पीबीएम प्रशासन ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है। अधीक्षक के आदेश पर बनाई गई इस कमेटी में उप अधीक्षक, पीडब्ल्यूडी अधिकारी और सुरक्षा प्रभारी शामिल किए गए हैं। समिति ने बैठक कर पूरे घटनाक्रम की समीक्षा शुरू कर दी है और अब रिपोर्ट राज्य के चिकित्सा शिक्षा सचिव को भेजी जाएगी।
मजेदार बात यह है कि जिस गेट को लेकर आज सरकारी संपत्ति को नुकसान की बात की जा रही है, वही गेट करीब पांच साल से बंद पड़ा था। मेडिसिन और सर्जरी ओपीडी दूसरी इमारत में शिफ्ट होने के बाद इसकी जरूरत नहीं समझी गई और प्रशासन ने इसे खोलना भी जरूरी नहीं समझा। मगर जनता की परेशानी सामने आई तो भाजपा नेताओं ने ताला तोड़कर रास्ता खोल दिया — और यहीं से मामला गरमा गया।
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर गेट बंद रखना इतना ही जरूरी था, तो उसकी हालत पर कभी ध्यान क्यों नहीं दिया गया? पीबीएम के ये भारी-भरकम प्रवेश द्वार करीब 15 साल पहले सौंदर्यीकरण के नाम पर बनाए गए थे। लाखों रुपए खर्च हुए, लेकिन आज हालत यह है कि पत्थरों की टाइलें झड़ रही हैं, चौकियां जर्जर हो चुकी हैं और पार्क टूट-फूट का शिकार हैं।
विडंबना यह है कि सालों की अनदेखी पर कोई जांच नहीं, कोई कमेटी नहीं — लेकिन ताला टूटते ही नियम, प्रक्रिया और फाइलें सब सक्रिय हो गईं। लगता है पीबीएम में समस्या तब तक समस्या नहीं होती, जब तक वह हथौड़े की आवाज के साथ सामने न आ जाए।

