बीकानेर के अरजनसर निवासी अजय गोदारा पढ़ाई के सपने और बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर 28 नवंबर 2024 को स्टडी वीज़ा पर रूस गए थे। घर वालों की दुआएँ साथ थीं… लेकिन हालात ऐसे बने कि एक छात्र को बिना इच्छा, बिना प्रशिक्षण युद्ध जैसे हालात में धकेल दिया गया—और अंततः उसकी जान चली गई, एक ऐसे संघर्ष में जिसका उससे कोई लेना-देना नहीं था।
अजय अकेला नहीं था। उसके साथ 20–25 भारतीय युवक रूस में फँसे हुए थे, जिन्होंने सितंबर 2025 में वीडियो जारी कर मदद की गुहार लगाई थी। वह वीडियो सिर्फ अपील नहीं था— वह आने वाले खतरे की आख़िरी चेतावनी थी। पर चेतावनियाँ फ़ाइलों में दबी रहीं।परिवार ने मंत्रियों के दरवाज़े खटखटाए, चक्कर काटे—लेकिन सिस्टम ने वही किया जिसमें वह सबसे माहिर है: देरी।
बुधवार शाम करीब 4 बजे अजय का पार्थिव शरीर अरजनसर पहुँचा, रूस का राष्ट्रीय ध्वज और वर्दी साथ थी। दृश्य सम्मानजनक था…पर सवाल बेहद कड़वा—जब एक शव वापस लाया जा सकता है, तो एक ज़िंदा इंसान को समय रहते क्यों नहीं बचाया गया? यह किसी पार्टी या व्यक्ति पर आरोप नहीं, यह उस व्यवस्था से सवाल है जहाँ आम नागरिक की ज़िंदगी अक्सर “प्रक्रिया में है” कहकर टाल दी जाती है।अजय इकलौता बेटा था। यह सिर्फ एक मौत नहीं, एक परिवार के सारे सपनों का अंत है—जिसकी भरपाई कोई मुआवज़ा नहीं कर सकता।
आज श्रद्धांजलि काफी नहीं। ज़रूरत है जवाबदेही, संवेदनशीलता और तेज़ एक्शन सिस्टम की—ताकि अगला अजय सिर्फ खबर न बने। अजय गोदारा को नमन।
आपकी कहानी एक व्यक्ति की नहीं,पूरे सिस्टम का आईना है।





