ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बॉन्डी बीच पर रविवार को जो हुआ, उसने यह कड़वा सच फिर सामने रख दिया कि नफरत को बहाने नहीं चाहिए, हथियार मिल जाएं तो वह खुद रास्ता बना लेती है। इस आतंकी हमले में अब तक 16 लोगों की मौत हो चुकी है और 45 लोग घायल हैं। मरने वालों में एक 10 साल की मासूम बच्ची और एक इजराइली नागरिक भी शामिल है। पुलिस के मुताबिक, हमला करने वाले पाकिस्तानी मूल के पिता-पुत्र थे, जिन्होंने हनुक्का फेस्टिवल मना रहे लोगों पर स्नाइपर गन से अंधाधुंध फायरिंग की। पिता मौके पर पुलिस की गोली से मारा गया, जबकि बेटा गंभीर हालत में अस्पताल में है।
जांच में सामने आया है कि आरोपी पिता के पास हथियारों की कोई कमी नहीं थी—वह गन क्लब का सदस्य था और उसके पास कई लाइसेंसी बंदूकें थीं। यानी सिस्टम ने सब कुछ “कानूनी” तरीके से दे दिया, नतीजा सबके सामने है। हमले से पहले दोनों घर से यह कहकर निकले थे कि मछली पकड़ने जा रहे हैं—किसी को अंदाजा नहीं था कि लौटते वक्त पीछे लाशों का सन्नाटा छोड़ जाएंगे। घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी गरमा गई है। इजराइल के प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया की नीतियों पर सवाल उठाते हुए यहूदी-विरोधी माहौल को जिम्मेदार ठहराया, जबकि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने मौके पर पहुंचकर पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। बॉन्डी बीच पर फूल, झंडे और खामोशी है—लेकिन सवाल वही पुराना है: जब चेतावनियां समय पर थीं, तो जवाब हमेशा बाद में ही क्यों आते हैं?



