बीकानेर की टूटी सड़के – और उनसे भी ज्यादा टूटे नेताओं के वादे!
बीकानेर की सड़कों पर चलना अब किसी रोमांचक सफर से कम नहीं। कहीं गड्ढे इतने गहरे कि लगता है झील में उतर गए हों, कहीं सड़क इतनी टूटी कि वाहन के पुर्ज़े जवाब दे जाएं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जनता की इन टूटी सड़कों से ज्यादा नेताओं के वादे टूटे पड़े हैं।
चुनावी वादे – सड़क जैसी किस्मत
हर चुनाव से पहले नेता वादा करते हैं:
“सड़कें चौड़ी और पक्की बनाएंगे”
“शहर को गड्ढा-मुक्त करेंगे”
“बीकानेर को स्मार्ट सिटी बनाएंगे”
लेकिन जैसे ही वोट पड़ जाते हैं, ये वादे भी सड़कों की तरह दरक जाते हैं। जनता फिर अगले चुनाव तक गड्ढों में धंसती रहती है।
जनता की हालत
दोपहिया वाहन चालक रोज़ हादसे का शिकार होते हैं।
बारिश आते ही सड़कें दलदल में बदल जाती हैं।
एम्बुलेंस और स्कूली वाहन गड्ढों में फँस जाते हैं।
व्यापारियों और आम लोगों का समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है।
नेताओं के आलीशान बंगले बनाम टूटी सड़कें
विडंबना देखिए – नेताओं के घरों तक जाने वाली सड़कें हमेशा चमचमाती रहती हैं। लेकिन आम जनता जिन रास्तों से गुजरती है, वहाँ गड्ढे ही गड्ढे हैं।
क्या सड़कें सिर्फ़ नेताओं और अफसरों के लिए बनती हैं?
प्रशासन की चुप्पी
प्रशासन और नगर निगम बार-बार टेंडर पास करने और योजनाओं का ढिंढोरा पीटते हैं, लेकिन असल में जनता के हिस्से में आता है – धूल, गड्ढे और धोखा।
जनता से सवाल
👉 कब तक बीकानेर की जनता गड्ढों में गिरेगी?
👉 कब तक नेताओं के वादों की तरह सड़कें भी बार-बार टूटती रहेंगी?
👉 आखिर बीकानेर को गड्ढा-मुक्त शहर बनाने का सपना कब सच होगा?
निष्कर्ष
बीकानेर की टूटी सड़कें सिर्फ शहर की बदहाली नहीं दिखातीं, बल्कि नेताओं के झूठे वादों का भी आईना हैं।
अब वक्त आ गया है कि जनता नेताओं से पूछे – सड़कें टूटी क्यों हैं, और वादे कब पूरे होंगे?
बीकानेर की टूटी सड़के – और उनसे भी ज्यादा टूटे नेताओं के वादे!
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Puchta Hai Bikaner की शुरुआत बीकानेर की असली समस्याओं को लोगों तक पहुँचाने की पहल के रूप में हुई थी। हमारी टीम बिना किसी लाग-लपेट के शहर और प्रदेश की आवाज़ आप तक पहुँचाने का काम कर रही है।"
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