यहाँ की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि मुसीबत भी स्थायी है और समाधान भी कभी आया ही नहीं।
पानी की समस्या 20–25 साल से ज्यों की त्यों पड़ी है। बारिश आते ही सड़कें नदियों में बदल जाती हैं—माता जी मंदिर इलाका हो या आसपास की दुकानें, हर बार बरसात का पानी और कीचड़ दुकानदारों की कमाई को बहा ले जाता है। लेकिन कमाल देखिए… आज तक किसी ने आवाज़ तक नहीं उठाई।
इतने सालों में विधायक जी चुनावी मौसम में आते हैं, वादों की झड़ी लगाते हैं और फिर गायब।
पार्षद जी कहते हैं कि उन्होंने कई बार शिकायत पहुंचाई, लेकिन सड़क निर्माण फाइल पर विधायक जी ने अभी तक साइन तक नहीं किए।
तो सवाल बिल्कुल सीधा है—
विधायक जी, आख़िर आप चाहते क्या हो? गिन्नाणी ऐसे ही डूबती रहे?
लेकिन सारा दोष केवल नेताओं का भी नहीं है…
कुछ गलती हमारे ही लोगों की भी है!
हर रोज़ चौकियाँ धोने के नाम पर सड़क पर इतना पानी व कीचड़ फैला दिया जाता है कि रोड पर गड्ढे बनना तय है। ऊपर से कुछ लोग घर का कचरा भी सीधे गलियों में फेंककर चले जाते हैं।
फिर कहते हैं—“विकास नहीं हो रहा।”
अरे भाई, विकास सिर्फ पोस्टर पर नहीं होता, जमीन पर भी दिखना चाहिए — और उसकी शुरुआत civic sense से होती है।
और हाँ, पार्षद जी की चुप्पी भी अब सवालों में है—
अगर मुद्दा इतना बड़ा था, तो आज तक एक भी ज़ोरदार प्रदर्शन क्यों नहीं हुआ?
क्या जनता की समस्या सिर्फ कागज़ पर आगे भेज देने से हल हो जाती है?
पुरानी गिन्नाणी का दर्द सिर्फ कीचड़ और पानी का नहीं…
ये उन वादों का दर्द है जो कभी पूरे नहीं हुए, उन जिम्मेदारियों का दर्द है जो कभी निभाई नहीं गईं, और उन आदतों का दर्द है जिन्हें बदलना हम आज तक जरूरी नहीं समझे। नीचे फोटो पर क्लिक कर वीडियो जरूर देखे

