आज के दौर में सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को समाज की सबसे तेज़ और प्रभावशाली आवाज़ माना जाता है। किसी मुद्दे पर एक वीडियो या पोस्ट लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। लेकिन खेजड़ी बचाओ आंदोलन जैसे संवेदनशील और मानवीय मुद्दे पर बीकानेर और राजस्थान के कई चर्चित चेहरे अब तक खामोश नज़र आ रहे हैं। जब आम जनता कठिन हालात में बैठी है—भूखी, प्यासी और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रही है—तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिनकी आवाज़ दूर तक जाती है, वे इस समय क्यों नहीं पहुँच रही? यह किसी पर आरोप नहीं, बल्कि एक विनम्र याद दिलाना है कि प्रभाव का मतलब केवल ट्रेंड बनाना नहीं, बल्कि ज़रूरत के समय साथ खड़ा होना भी होता है। अगर एक-दो लोग भी आवाज़ उठाएँ, तो संदेश पूरे प्रदेश तक जा सकता है।
खेजड़ी बचाओ आंदोलन कोई उग्र प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रकृति और भविष्य को बचाने की शांत अपील है। प्रशासन और समाज—दोनों की जिम्मेदारी है कि इस आवाज़ को समय रहते सुना जाए, क्योंकि चुप्पी कभी-कभी जवाब से भी ज़्यादा बोलती है।

