नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आवारा कुत्तों को लेकर ऐसी बहस हुई, जिसमें कानून से ज़्यादा “कुत्तों के मूड” चर्चा में रहे। कहीं काउंसलिंग की बात चली, कहीं कम्युनिटी डॉग्स और इंस्टीट्यूशनलाइज्ड डॉग्स जैसे भारी-भरकम शब्द उड़ते रहे। मगर सवाल सीधा था—सड़क पर सुरक्षित कौन रहेगा, इंसान या आवारा कुत्ता?
जस्टिस विक्रम नाथ ने दो टूक कहा कि मामला सिर्फ काटने तक सीमित नहीं है। आवारा कुत्ते दुर्घटनाओं का भी बड़ा खतरा हैं। सड़कों को उनसे खाली रखना होगा। आखिर सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में है, यह जानने के लिए कोई “डॉग मूड मीटर” तो है नहीं। कुत्तों के पक्ष में दलील देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि मंदिरों में जाने पर उन्हें कभी किसी कुत्ते ने नहीं काटा। इस पर सुप्रीम कोर्ट का जवाब भी उतना ही सीधा और तीखा था—“आप खुशकिस्मत हैं।” हकीकत यह है कि आम लोग काटे जा रहे हैं, बच्चे शिकार बन रहे हैं और कई मामलों में जान तक जा रही है।
कपिल सिब्बल ने समाधान भी बताया—अगर कुत्ता काट ले, तो कॉल कीजिए, उसे पकड़कर सेंटर ले जाया जाएगा, नसबंदी होगी और फिर उसी इलाके में छोड़ दिया जाएगा। इस पर कोर्ट ने तंज कसते हुए कहा कि अब बस एक ही चीज़ बाकी है—कुत्तों की काउंसलिंग, ताकि लौटने के बाद वो फिर न काटें। करीब ढाई घंटे चली इस “डॉग डिबेट” के बाद सुनवाई रोक दी गई। अगली सुनवाई 8 जनवरी को सुबह 10:30 बजे होगी। तब तक सवाल वही है—सड़क पर इंसान संभले या कुत्तों का मूड?




