जब बात आती है शहर बीकानेर की, तो बड़े-बड़े मंचों पर गर्जने वाले मंत्री तक चुप हो जाते हैं।
जी हाँ—मैं बात कर रहा हूँ म्हारो प्यारो बीकाणो की…
वही बीकानेर, जिसे सोशल मीडिया पर लोग “उभरता शहर”, “तेज़ी से विकसित होता क्षेत्र” जैसे शब्दों में सजाकर पोस्ट करते हैं।
लेकिन धरातल पर? वास्तविकता की हालत तो पोस्ट के फिल्टर से भी खराब है।
सीवर लाइन का काम पिछले दो साल से ‘प्रगति पर’ नहीं—‘ठहराव पर’ है।बीकानेर में ऐसी कोई सड़क ढूंढना मुश्किल है, जिसका काम अधूरा न पड़ा हो।और अगर ये ही ‘विकास’ है…
तो मंत्री जी, ज़रा बिना रूट-प्रोटोकॉल के उस सड़क से होकर गुजरिए—पता चल जाएगा मिनटों में चमकाने का मतलब क्या होता है।
जनता जिसने आपको दिल्ली भेजा…आज वही जनता परेशान है। नए-नए वोट डालने वाले युवा—निराश।
आम आदमी—थका हुआ।बीकानेर की गलियों में चलना अब रोमांच नहीं, खतरा हो गया है। कभी चोरी, कभी लूट, कभी नशे का जाल… ऊपर से अपराधियों की ऐसी दहाड़ कि लगता है—
“कानून भी शायद उनका ही चाचा लगता है।”और सबसे बड़ा सवाल—मंत्री जी, आख़िर आपके समझ क्यों नहीं आ रहा बीकानेर का दर्द? यदि आप चाहें, तो एक रात में पुलिस प्रशासन को कड़े निर्देश देकरअपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है।आप चाहें तो कुछ ही महीनों में अपराध का ग्राफ नीचे गिर सकता है।लेकिन न जाने क्यों…यहाँ अपराधियों को भी किसी अजीब-सा भरोसा रहता है—
“कर लो, कोई रोकने वाला नहीं।” कहीं ना कहीं,प्रशासन और कुछ लोगों का अनकहा गठजोड़ ही शायद वह वजह है,
जिसकी वजह से अपराधी खुलेआम घूमते हैं…और जनता हर दिन खौफ में जीती है। बीकानेर की ये हालत देखकर एक ही बात समझ आती है—विकास की असली तस्वीर पोस्ट में नहीं, पगडंडी में दिखती है। और अभी की तस्वीर साफ़ कहती है—बीकानेर को काम की ज़रूरत है, भाषण की नहीं।
जब बात बीकानेर की सड़कों, अपराध और बदहाल सिस्टम की आती है… तो मंत्री भी चुप, अधिकारी भी चुप—आख़िर किसके भरोसे जिये ये शहर? देखें कैसे ‘विकास’ बस फोटो तक सीमित रह गया!

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Puchta Hai Bikaner की शुरुआत बीकानेर की असली समस्याओं को लोगों तक पहुँचाने की पहल के रूप में हुई थी। हमारी टीम बिना किसी लाग-लपेट के शहर और प्रदेश की आवाज़ आप तक पहुँचाने का काम कर रही है।"
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