शाम अरावली को बचाने के नाम पर एक जन-चर्चा / जन-संवाद रखा गया है, जहाँ खास तौर पर युवाओं से सीधी बातचीत होगी। सवाल साफ है—वे क्या सोचते हैं, क्या कहना चाहते हैं, और क्या उनकी आवाज़ अब भी सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन तक सीमित रह गई है? समय रखा गया है रात 8:00 बजे और उम्मीद है कि लोग “फुर्सत नहीं है” वाले बहाने घर पर ही छोड़कर आएँगे। 18 दिसंबर 2025 शाम 8 बजे जरूर पधारे
यह कोई औपचारिक सभा नहीं है, न ही एक और भाषण सुनकर घर लौट जाने की रस्म। यह उस अरावली की बात है, जो हर दिन थोड़ी-थोड़ी गायब हो रही है और हम उसे देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। “अरावली बचेगी, तभी भविष्य बचेगा”—यह नारा अब स्लोगन नहीं, चेतावनी बन चुका है। इंस्टाग्राम पर “बीकानेरी आवाज़” लगातार सबको जगाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सच यह है कि हम इतने सुन्न हो चुके हैं कि अपनी ही जन्मभूमि की आवाज़ सुनाई नहीं देती। शायद हमें तब समझ आए जब अरावली सिर्फ़ किताबों या पुरानी तस्वीरों में रह जाए। यह संवाद सिर्फ़ चर्चा नहीं, हमारी जिम्मेदारी है—और जिम्मेदारी से भागने में हम वैसे भी एक्सपर्ट हो चुके हैं।




