महापड़ाव में अचानक एक नया मोड़ सामने आया है। आंदोलन के बीच अब आरोपों का दौर शुरू हो गया है और सवाल सिर्फ सरकार पर ही नहीं, बल्कि आंदोलन से जुड़े कुछ चेहरों पर भी उठने लगे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि पैसों के फायदे को देखते हुए धरना खत्म कराने की कोशिश की गई, जिससे जनता में नाराज़गी फैल गई। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि जब तक खेजड़ी संरक्षण को लेकर कानून नहीं बनता, तब तक धरना खत्म नहीं होगा। अनशन को लेकर भी स्थिति स्पष्ट कर दी गई है—लिखित आश्वासन मिलेगा तभी अनशन टूटेगा, उससे पहले कोई समझौता नहीं। नेताओं की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई नेता मौके पर आए, बयान दिए और आपसी टकराव छोड़कर चले गए, लेकिन ज़मीनी समाधान कहीं दिखाई नहीं दिया। कुछ नामों द्वारा केवल 2 संभाग और 16 जिलों में खेजड़ी कटाई पर रोक लगाए जाने की बात सामने आई है, जिस पर आंदोलनकारियों ने सवाल उठाया है कि जब मुद्दा पूरे राजस्थान का है तो समाधान अधूरा क्यों?
लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि कहीं न कहीं बड़ी कंपनियों के दबाव और आर्थिक हित इस पूरे मामले को प्रभावित कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनता के मन में संदेह गहराता जा रहा है। सुभाष बिश्नोई ने जानकारी देते हुए कहा कि अनशन जल्द समाप्त हो सकता है क्योंकि बड़े नेताओं का समर्थन मिल रहा है और प्रशासन बातचीत में लगा हुआ है। लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि अनशन सिर्फ लिखित आश्वासन पर ही टूटेगा, जबकि धरना तब तक जारी रहेगा जब तक खेजड़ी संरक्षण को लेकर ठोस कानून नहीं बन जाता।
लिखित आश्वासन के बिना नहीं टूटेगा अनशन, धरना जारी रहेगा नेताओं ने दिया सिर्फ आश्वासन 2 जिलों का देखे पूरी खबर

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1 Comment

सबसे उपयुक्त उपाय है जहां खेजड़ी या कोई भी पौधा काटने की नौबत आए वहा NOC ही नहीं दी जानी चाहिए ।
एक गलती मेरे हिसाब से हुई है इस आंदोलन में वह यह की इन्होंने बहुत जल्दी भूख हड़ताल का ऐलान कर दिया । और अब अनशन पर आ गए ।
बल्कि स्थिति तब मजबूत होती की starting से अनशन पर रहते और आज जैसा मौका देखकर भूख हड़ताल पर shift होता ।
तब मेरे विचार में ज्यादा असरदार होता ।
लेकिन मुद्दा यह है कि क्या विकास की प्रगति रोकी जाएगी या फिर पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखा जाएगा ?
परन्तु यह तय है न तो विकास बाधित होगा और न ही पेड़ कटेंगे।