बीकानेर के सरकारी स्कूलों का सच – प्रिंसिपल आधे दिन आते हैं, सैलरी पूरी उठाते हैं!

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Puchta Hai Bikaner की शुरुआत बीकानेर की असली समस्याओं को लोगों तक पहुँचाने की पहल के रूप में हुई थी। हमारी टीम बिना किसी लाग-लपेट के...
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बीकानेर के सरकारी स्कूलों का सच – प्रिंसिपल आधे दिन आते हैं, सैलरी पूरी उठाते हैं!
शिक्षा को विकास की रीढ़ कहा जाता है। लेकिन अगर शिक्षा देने वाले ही गैर-जिम्मेदार हों तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा? बीकानेर के सरकारी स्कूलों की हालत यही कहानी कह रही है।
प्रिंसिपल साहब की हाज़िरी
सुबह देर से स्कूल पहुँचना आम बात हो गई है।
कई बार आधे दिन बाद ही स्कूल छोड़कर चले जाते हैं।
बच्चों और शिक्षकों पर ध्यान देने की बजाय राजनीति और निजी कामों में ज़्यादा व्यस्त रहते हैं।
सैलरी पूरी – काम आधा!
विडंबना देखिए, जनता के टैक्स के पैसे से मोटी तनख्वाह मिलती है।
महीने की पूरी सैलरी समय पर उठाते हैं।
सुविधाएँ और भत्ते सब लेते हैं।
लेकिन ज़िम्मेदारी निभाने का समय आए तो नज़र नहीं आते।
बच्चों का भविष्य अंधेरे में
जब प्रिंसिपल स्कूल में ही मौजूद नहीं रहेंगे, तो शिक्षकों पर नियंत्रण कौन रखेगा?
पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है।
बच्चे प्रतियोगी परीक्षा और निजी स्कूलों के बच्चों से पिछड़ रहे हैं।
प्रशासन की लापरवाही
शिक्षा विभाग और प्रशासन को इन सब बातों की जानकारी है, लेकिन कोई सख़्त कार्रवाई नहीं होती।
क्या यह मिलीभगत नहीं कि प्रिंसिपल गैर-ज़िम्मेदार बने रहें और विभाग चुपचाप सब देखता रहे?
जनता से सवाल
👉 जनता के टैक्स के पैसे से मिलने वाली तनख्वाह का हिसाब कौन देगा?
👉 बच्चों का भविष्य बर्बाद करने वालों पर कार्रवाई कब होगी?
👉 क्या शिक्षा सिर्फ़ भाषणों और घोषणाओं तक सीमित रह जाएगी?
निष्कर्ष
अगर बीकानेर के सरकारी स्कूलों में यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ अंधेरे में रहेंगी।
नेताओं और प्रशासन को जनता से जवाब देना होगा और ऐसे गैर-जिम्मेदार प्रिंसिपलों पर कार्रवाई करनी ही होगी

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Puchta Hai Bikaner की शुरुआत बीकानेर की असली समस्याओं को लोगों तक पहुँचाने की पहल के रूप में हुई थी। हमारी टीम बिना किसी लाग-लपेट के शहर और प्रदेश की आवाज़ आप तक पहुँचाने का काम कर रही है।"
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